उठो चलो
अब चल भी दो
कि वक़्त की पुकार है
जो समाज का विकार है
घिसट घिसट के चल रहा है जो
नस नस में पल रहा है जो
वो रोग हम सभी में है
तू ही उसे घटाएगा
अपने खून से मिटायेगा
सदी से पल रहा है जो
वो भ्रूंड भ्रष्टाचार का
द्वेष के प्रचार का
मासूम पे अत्याचार का
कलंक हर प्रकार का
तू ही जवान धोएगा
फिर हाँथ से पिरोयेगा
सपना नए समाज का
चमकते हुए प्रभात का
सुन
अब तो तू भी सुन ही ले
कौंध फटती धरती की
गूँज रोते आकाश की
कि महसूस कर
अब तो कर भी ले
उबाल गर्म खून का
मर्म झुके प्रसून का
खुद को एक जवाब दे
क्या तू ही देख पायेगा
खाक हुई बस्ती को
बिलखते हुए बच्चों को
चिथड़े में लिपटी नार को
और टूटे हुए संसार को
नहीं देख सकता है तो सुन
उस दुष्ट पे प्रहार कर
हर द्वेष का बहिष्कार कर
हर मानव से तो प्यार कर
इस धरती का उद्हार कर
उठो चलो
अब चल भी दो
तेरा घर यही संसार है
इसी में तेरा
इसी में मेरा
इसी में सबका उद्हार है
यही तो जीवन सार है
Posted by: Nitin Mohan Srivastava | November 26, 2007
वक़्त कि पुकार
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