आज फिर किसी अनजाने साए कि परछाई में छुपे हुएँ हैं कुछ शब्द
हलक में अटके हुए हैं, जुबान पे आते ही नहीं कुछ शब्द
बंधे बंधे से, वजनी वजनी से सीने में सिरहन की तरह तैरते हुए कुछ शब्द
दाब ऐसा की नब्जें फटने लगी, और रात भर सीने में अंगार की तरह जलते रहे कुछ शब्द
कुछ शब्द दिल के खालीपन में डूबे रहे
कुछ शब्द सहमें सहमें से अपना वजूद तलाशते रहे
कुछ शब्द कौंधते रहे सुबह-शाम मेरे दिल-ओ-दिमाग में
और कुछ शब्द आईने में अपना अर्थ ढूँढ़ते रहे
सोंचता हूँ की आखिर कब तक छुपे रहेंगे इस तरह कुछ शब्द
कब तक मेरे सीने में हलचल मचाते रहेंगे कुछ शब्द
कब तक मुझको मुझसे ही लड़ते रहेंगे कुछ शब्द
कब तक तेरी यादों के नर्म साए कि याद दिलाते रहेंगे कुछ शब्द
हाँ ये तुम ही तो हो जो मेरे थरथराते होंठो पे शब्द बनके मचलना चाहती हो
तुम ही तो हो जो चेहरे पे मेरे मुस्कान बनके बिखरना चाहती हो
कुछ शब्द तुम्हारी यादों में ढलते रहे, और गर्म सांसें तेरी खुशबू में थिरकती रहीं
तुम प्यास बनकर गले से चिपकी रही, और लहू बनकर रगों में दौड़ती रह
मैं तुम्हे नज़रंदाज़ करता रहा और तुम मुझे शब्दों कि उलझन बनकर छेड़ती रही
मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ
चीर दो मेरे सीने को ज़िन्दगी के खंजर से और निकल फेको उसमें से बनते बिगड़ते, कुछ शब्द